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एक शौक ने मचा दी तबाही! 13 खरगोशों की कहानी जानकर रह जाएंगे हैरान

 


क्या कोई यह कल्पना कर सकता है कि केवल 13 छोटे-से खरगोश किसी पूरे देश की पर्यावरणीय व्यवस्था, कृषि और अर्थव्यवस्था को दशकों तक प्रभावित कर सकते हैं? सुनने में यह कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन यह ऑस्ट्रेलिया के इतिहास की एक वास्तविक घटना है, जिसे दुनिया आज भी पर्यावरण प्रबंधन की सबसे बड़ी गलतियों में गिनती है।

करीब 160 वर्ष पहले मनोरंजन और शिकार के उद्देश्य से लाए गए कुछ यूरोपीय जंगली खरगोश आज भी ऑस्ट्रेलिया के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। उनकी तेजी से बढ़ती आबादी ने न केवल प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को नुकसान पहुंचाया बल्कि खेती, वनस्पति और स्थानीय वन्यजीवों पर भी गहरा असर डाला।

आज भी वैज्ञानिक और सरकार विभिन्न उपायों के जरिए इनकी संख्या नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है।

1859 में हुई थी शुरुआत

इस पूरी कहानी की शुरुआत वर्ष 1859 में हुई थी।

बताया जाता है कि इंग्लैंड मूल के जमींदार थॉमस ऑस्टिन ने शिकार और मनोरंजन के उद्देश्य से ब्रिटेन से 13 यूरोपीय जंगली खरगोश ऑस्ट्रेलिया मंगवाए।

उस समय शायद किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि यह छोटा-सा फैसला आने वाले वर्षों में पूरे महाद्वीप के लिए गंभीर पर्यावरणीय संकट का कारण बन जाएगा।

खरगोशों को खुले वातावरण में छोड़ दिया गया, जहां उन्हें तेजी से फैलने के लिए लगभग आदर्श परिस्थितियां मिल गईं।

ऑस्ट्रेलिया क्यों बना खरगोशों के लिए स्वर्ग?

विशेषज्ञों के अनुसार यूरोपीय खरगोशों के लिए ऑस्ट्रेलिया का मौसम बेहद अनुकूल साबित हुआ।

इसके पीछे कई कारण थे—

  • विशाल खुले घास के मैदान

  • भोजन की पर्याप्त उपलब्धता

  • प्राकृतिक शिकारी जीवों की कमी

  • तेजी से प्रजनन करने की क्षमता

मादा खरगोश एक वर्ष में कई बार बच्चों को जन्म दे सकती है। प्रत्येक बार कई शावकों का जन्म होने के कारण उनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी।

कुछ ही दशकों में यह संख्या हजारों से लाखों और फिर करोड़ों तक पहुंच गई।

पूरे महाद्वीप में फैल गई आबादी

खरगोशों की आबादी इतनी तेजी से बढ़ी कि वे ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश हिस्सों में फैल गए।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि कुछ समय बाद उनकी संख्या करोड़ों में पहुंच गई थी।

इतनी बड़ी आबादी ने प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डालना शुरू कर दिया।

जहां भी वे पहुंचे, वहां की वनस्पति तेजी से खत्म होने लगी।

खेती को हुआ भारी नुकसान

ऑस्ट्रेलिया की कृषि व्यवस्था पर खरगोशों का सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा।

ये खरगोश—

  • फसलों को खाते रहे,

  • नई पौध को नष्ट करते रहे,

  • खेतों में बिल बनाते रहे,

  • चारागाहों को नुकसान पहुंचाते रहे।

कई इलाकों में किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।

आज भी ऑस्ट्रेलिया में जंगली खरगोशों को कृषि के लिए प्रमुख कीट प्रजातियों में गिना जाता है।

प्राकृतिक पारिस्थितिकी पर भी पड़ा असर

खरगोशों ने केवल खेती को ही नहीं बल्कि पूरे पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित किया।

इनकी अत्यधिक चराई के कारण—

  • नई वनस्पति उगना मुश्किल हो गया।

  • मिट्टी का कटाव बढ़ने लगा।

  • कई स्थानीय पौधों की प्रजातियां प्रभावित हुईं।

  • देशी शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन कम होने लगा।

इसका प्रभाव पूरे खाद्य श्रृंखला (Food Chain) पर देखने को मिला।

इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरण कानूनों में इन्हें आक्रामक (Invasive) प्रजाति माना जाता है।

सरकार ने बनाई हजारों किलोमीटर लंबी बाड़

समस्या बढ़ने के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने खरगोशों को रोकने के लिए विशाल बाड़ (Rabbit-Proof Fence) बनाने का फैसला किया।

हजारों किलोमीटर लंबी यह बाड़ उस समय दुनिया की सबसे बड़ी बाड़ों में से एक मानी गई।

उम्मीद थी कि इससे खरगोशों का फैलाव रुक जाएगा।

लेकिन तब तक वे देश के अधिकांश हिस्सों में फैल चुके थे।

इस कारण यह योजना अपेक्षित सफलता नहीं दिला सकी।

बिल नष्ट करने का अभियान

इसके बाद सरकार ने खरगोशों के बिलों को नष्ट करने का अभियान शुरू किया।

कई क्षेत्रों में—

  • बिलों को खोदा गया,

  • मशीनों से मिट्टी भर दी गई,

  • आवास नष्ट किए गए।

इससे कुछ इलाकों में उनकी संख्या कम हुई, लेकिन पूरे देश में इसका स्थायी असर नहीं पड़ा।

फिर लिया गया वायरस का सहारा

जब पारंपरिक तरीके पर्याप्त सफल नहीं हुए तो वैज्ञानिकों ने जैविक नियंत्रण (Biological Control) का रास्ता अपनाया।

1950 के दशक में मायक्सोमा वायरस

सरकार ने मायक्सोमा वायरस का उपयोग किया।

शुरुआत में इसका असर बेहद प्रभावी रहा।

खरगोशों की आबादी में भारी गिरावट दर्ज की गई।

लेकिन कुछ वर्षों बाद कई खरगोशों में इस वायरस के प्रति प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) विकसित हो गई।

इसके बाद वायरस का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा।

1990 के दशक में RHDV वायरस

इसके बाद वैज्ञानिकों ने Rabbit Haemorrhagic Disease Virus (RHDV) का प्रयोग किया।

यह वायरस विशेष रूप से शुष्क क्षेत्रों में काफी प्रभावी साबित हुआ।

हालांकि—

  • ठंडे इलाकों में,

  • अधिक नमी वाले क्षेत्रों में,

इसका असर अपेक्षाकृत कम देखा गया।

इस कारण यह भी सम्पूर्ण समाधान नहीं बन पाया।

रासायनिक उपाय भी अपनाए गए

सरकार ने कई अन्य तरीके भी अपनाए।

इनमें शामिल थे—

  • सोडियम फ्लोरोएसीटेट जैसे विषैले रसायनों का उपयोग,

  • बिलों में गैस भरना,

  • बड़े पैमाने पर नियंत्रण अभियान।

इन उपायों से कुछ क्षेत्रों में सफलता मिली, लेकिन खरगोशों की तेज प्रजनन क्षमता और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलने की योग्यता ने समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया।

आज भी बनी हुई है चुनौती

करीब 160 वर्ष बीत जाने के बाद भी ऑस्ट्रेलिया इस समस्या से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इतने बड़े भूभाग में फैली खरगोशों की आबादी को पूरी तरह समाप्त करना लगभग असंभव है।

इसलिए अब लक्ष्य उन्हें खत्म करना नहीं बल्कि उनकी संख्या को नियंत्रित रखना है।

लगातार जारी है शोध

आज ऑस्ट्रेलिया में वैज्ञानिक नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं।

इनमें शामिल हैं—

  • बेहतर जैविक नियंत्रण,

  • पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन,

  • आधुनिक निगरानी प्रणाली,

  • स्थानीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा।

सरकार किसानों और पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ मिलकर विभिन्न रणनीतियों पर लगातार काम कर रही है।

दुनिया के लिए बड़ी सीख

यह घटना केवल ऑस्ट्रेलिया की समस्या नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी विदेशी जीव को बिना व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन के नए वातावरण में छोड़ना भविष्य में गंभीर पारिस्थितिक संकट पैदा कर सकता है।

आज दुनिया के कई देशों में आक्रामक प्रजातियों (Invasive Species) से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए इस घटना को पर्यावरण संरक्षण के अध्ययन में प्रमुख उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता है।

महज 13 यूरोपीय खरगोशों से शुरू हुई यह कहानी आज दुनिया के सबसे बड़े पर्यावरणीय संकटों में से एक मानी जाती है। तेज प्रजनन, अनुकूल जलवायु और प्राकृतिक शिकारियों की कमी ने इन्हें ऑस्ट्रेलिया में इतना फैला दिया कि सरकार को दीवारें बनाने, वायरस छोड़ने और अनेक वैज्ञानिक उपाय अपनाने पड़े। इसके बावजूद चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यह घटना याद दिलाती है कि प्रकृति के संतुलन में छोटी-सी मानवीय गलती भी आने वाली कई पीढ़ियों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है।

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